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Friday, December 25, 2015

two lines

हर जुर्म पे उठती हैं उंगलियां मेरी तरफ,
क्या मेरे सिवा शहर में मासूम हैं सारे..??
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कौन न मर जाए इस सादगी पर ऐ खुदा,
खफा है मगर करीब बैठे है.
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बहाना कोई तो ये जिंदगी दे
की जीने के लिए मजबूर हो जाऊ
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जब मिलो किसी से तो जरा दूर का रिश्ता रखना,
बहुत तङपाते हैँ अक्सर सीने से लगाने वाले.
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आज भी आंसू से देता हूँ ब्याज तेरा,
तेरी मोहबत का कर्ज़ा बहुत भारी पड़ा.
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राख होता हुआ वजूद मुझसे थक कर सवाल करता है,
मुहब्बत करना तेरे लिए इतना ही जरुरी था क्या.
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वो बड़े ग़ौर से देखतें हैं , हमारी तस्वीर,
शायद उसमें , जान डालने का इरादा है उनका.
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सौ बार कहा दिल से, भूल जा उसको वो अब तेरी नहीं रही,
सौ बार कहा दिल ने, तुम दिल से नहीं कहते !!
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रॊज सोचता हू भूल जाऊ तुझे
रॊज ये बात भूल जाता हू मै
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ये तो कहिये इस खता की क्या सजा है,
मै जो कह दू आप पर मरता हू मै
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तरस खाओ मुझपर,, बस इतना बताओ हम दम…
तुम्हें वफ़ा नहीं आती, या तुमसे की नहीं जाती.

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